The power of thought

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Sunday, March 2, 2014

पुस्तकालयों का श्राप : एक व्यथा

पुस्तकालय अत्यंत ही धार्मिक स्थल होते है , जहाँ बैठ भविष्य के पुरोधा अपना स्वंय का भविष्य निर्माण का प्रयास करते  देखे जा सकते है । परन्तु भारत के पुस्तकालय अवश्य ही किसी श्राप का शिकार है क्योंकि न तो ये सरकारी प्राथमिकताओं में जगह बनाते है न ही खुद को मुद्दा । जो मौजूद है उनकी अवस्था यह बतलाती है कि उनके पीछे कि सरकारी मंशा बहुत बड़ी  है :
     क ) बेरोजगारों को रोजगार प्रदान करने कि (जो पुस्तकालय विज्ञानं पड़ने कि गलती कर बैठते है )
     ख ) प्रकाशित हो रही पुस्तकों को खरीद अर्थव्यवस्था को बढ़ाना
     ग ) समाचार पत्रो कि संख्या बढ़ा भारत कि अच्छी छवि प्रस्तुत करना
     घ ) ठेकेदारों , और अन्य निर्माण संबधी ठेकों से रोजगार सृजन , एवं
     च ) भारत में पुस्तकालय है यह प्रदर्शित करना और इसके लिए येन केन जो राशि प्राप्त है उसका व्यय , कि ।
               परन्तु कहीं भी , किसी भी सार्वजनिक पुस्तकालय का ध्येय पाठक केंद्रित नहीं है । वहाँ पढने कि लालसा रखने वाले बोझ ही है उनके लिए (यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि दक्षिण भारत में वास्तविक पुस्तकालय कुछेक जगह मौजूद है जो अपना वास्तविक उद्देश्य पूर्ण कर रहे है  ) ।
आज हर जगह एक ही नजारा है , नए सदस्यों को कैसे हतोत्साहित किया जाये और पुस्तकालय कर्मी उस पुलिस वाले कि तरह कार्य करते है जो ऍफ़.आई आर (FIR ) न लिखने के न जाने कितने बहाने बनाता है । पर उस पुलिस वाले के खिलाफ आवाज तो उठती है ऐसे लोगो के खिलाफ उदासीनता क्यों ?
दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के कर्मियों का कहना है कि "इस पुस्तकालय के नियम कठोर न हो तो लोग यहाँ आना शुरू कर देंगे । " और भी कई जगह यही हाल है । वहाँ आने वाले बुजुर्गों का (जो वहाँ रिटायर होने के बाद सरकारी पेंशन प्राप्त कर रहे है ) जो 5 रुपए का समाचार पढ़ने वहा चल कर आते है , का मानना है कि वहाँ आने वाले युवा पाठकों को वहां न आने दीया जाये , क्यों ? ताकि उनके जैसे लोग अपने नित्य के 5 रुपए बचा वहाँ सरकारी समाचार पत्र पढने आ सके ।
भारत जो एक समय विशाल पुस्तकालयों कि धरती थी पर आज ऐसा सूखा क्यों ? आखिर क्यों नहीं चाहती सरकारें और क्यों नही पुस्तकालय कर्मी कि वहाँ आ , लोग पढ़ सके ? या पुस्तकालयों कि वह संस्कृति नालंदा एवं विक्रमशिला के विशाल पुस्तकालयों के जलने के साथ ही समाप्त हो गयी । कदाचित उन जल रहे पुस्तकालयों का ही श्राप है यह ।
पुनः अगर कहीं थोड़ी बहुत सहूलियत दिखने कि गलती सरकारी विभाग कर दे तो वहाँ का पर्यावरण (पठन-पाठन का ) तो वहाँ आने वाले भारतीय कर ही देते है , आपस में बातें करना , अवांछित शोर तो जब पाठक ऐसा करते है तो कर्मचारी भी उनसे होड़ लगाना सुरु कर देते है । जो कुल जमा "पुस्तकालय दुर्दशा " परिणाम उत्त्पन्न करता है

Friday, January 31, 2014

निर्वस्त्र

 उनसे करना दोस्ती ही 
मेरी भारी एक भूल थी  । 
 दिन के उस दहाड़े , बत्ती रक्त के साये 
वो रौंद नोच गए उसे 
जो मेरे बगिया कि फूल थी ॥ 

वो बदहाल , बैचेन थी 
रोता अंदर , समझाता उसको मैं उसका बाप था । 
महामहिम को लाना व समझना अपना 
मेरा ही तो पाप था ॥ 

इस विपदा भूले जाने कितने मित्र याद आये 
मिलना उनसे कितने , ही सस्ते व्यंग्य लाये । 
खा सबसे धक्के , मैं सरकार को गया 
थे कदम जड़ , मैं रोता विलपता ही गया । 
साहेब ने उठाया , कंधे से लगाया 
आंसू पोंछे , पिला पानी कन्धा दिलवाया । 
फिर मीठी मुस्कान , तीखी आँखों का वक़्त आया 

जब उनकी तरफ से वो आदेश आया 
"आप वहाँ जाये , पर अपनी बेटी भेजे जाये "

परले बाद वो जड़ सी आयी और, मैं फिर रो पड़ा 
  क्योंकि कीड़ा उस फूल का अंतिम श्वास भी था पी गया ॥ 

दिनों बाद साहेब को मैं फिर याद आया 
उन्होंने फ़ौरन अपने कमरे में , बुलवाया । 
बुला अंदर उन्होंने अब खोलने को , मेरे कपडे 
वो कष्ट किया और मेरे गिरबान वो सर्पिल हस्त रखा । 
"पर मैं भी अब सावधान था 
जोकि इस बार मैं , पहले से ही निर्वस्त्र था "

Friday, January 17, 2014

भूख और भूँक

वो अपने पिल्ले के लिए हजारों की खरीददारी कर  निकले , और अपने पिल्ले को गोद में भर लिया । तभी उन्हें एहसास हुआ कोई उनका महंगा सूट खींच रहा है । पलटे तो देखा एक भूखा इंसानी बच्चा था, जिसे देख गोद में लेटा उनका बच्चा चीखने लगा । अपने बच्चे को रोता देख उनने उस भूखे को एक थप्पड़ जड़ दिया , जिससे वो गिर , भूँकने लगा ।

Monday, January 6, 2014

वेश्या

वह चलती है इतराती सी 
इठलाती , मदमाती सी । 
छिड़ती , नित ही जाती है ,
दिलफेकों कि आवारगी , वो 
हँस हँस सहते जाती है ॥ 

वो रोज ही घर से जाती है 
औ अहले सुबह ही आ पाती है । 
धंधे पे उसके आपत्ति है 
इन कर्णधार रखवालों को ,
क्योंकि , वो लाज़ बेच सुख पाती है ॥ 

लेकिन बेच खुद को ही तो 
पाल , परिवार वो अपना पाती है । 
गो खुद को वो समझाती है कि ,
जो रहना जिन्दा मज़बूरी है तो 
कुछ भी करना पड़ता है ॥ 

लेकिन पथरायी , नुंचायी देह की 
वह रूह सवाल कर जाती है  ,
"जो देह बेचने पर अधिकार नहीं तो ,
खरीदने पर , है क्यों सम्मान यहाँ" ??

वह देह नुचवाते जाती है 
और पेटों को भरते जाती है ।
आँखों में उपहास भर वो 
हम सब को देखती जाती है  
और पूछने पर नाम , खुद को 
वो "वेश्या " बतलाती है  ॥