The power of thought

The power of thought

Tuesday, July 23, 2013

मैं कौन : नारी

अधूरी थी राहें ,
अधूरी थी मैं
खुद के लिए मांगती
थी अधिकार मैं
 अधिकार,जो दे अधिकार
अधिकार,जो मुझसे पहले
उन सभ्य पुरुषों,धर्मगुरुओं को
होते स्वीकार !
 अधिकार, जो मुझको मेरे देश वतन,घर में
मेरे ही पिता,  द्वारा
मिलते मुझे उपहार में ,
उपहार,क्यूंकि इन पर मेरी प्रतिकिया न थी
उपहार,क्यूंकि यह मेरी नहीं
तुम्हारी मर्जी पर थी !
 उपहार,क्यूंकि मैं थी तो चाहती
गो पर मुझे मिले नहीं !
आश्वासन देकर तुमने घात-विश्वास किया
मेरा,मेरे ही घर में बलात्कार किया ,
सिर्फ तू नहीं कथित मेरे सगों ने भी
तब छल किया !
एक नहीं , न जाने कई बार किया !
आई जब गर्भ में,मैं तब मरी
हुई पैदा तब मरी
जो गयी पढने तब मरी
जो घर रही तब भी मरी ,
जो किया प्रेम तब मरी
जो न किया बिलकुल मरी !
मेरी ही मूर्ति सम्मुख नग्न हुई
अपने ही अक्स के आगे बेबस हुई !
परन्तु,सहती कब तक मैं ?
हाँ,मैं सह रही थी क्युकी दिल मेरा
विशाला है ,
जितना तू गिर न सका ,उतना मेरे अंदर
उजाला है !
पर,रे मुर्ख पापी ,ये भूल मत की
सर्वोच्च शक्ति भी मैं ही हूँ
आखिर
जब था हेतु वध महीष तब
था पड़ा मुझको ही आना 

Friday, July 19, 2013

कटाक्ष : एक अधूरी कविता

रे नारी ! तू मुर्ख है ,
है अल्पबुद्धि जो,मांगती अपने अधिकार है ।
आज हुआ कैसे तुझे खुद से ही प्यार है ?
तेरे,अंग प्रत्यंग की रचना हुई ही  है
मेरे विलास को,फिर कैसे
दे दूँ तुझे मैं,तेरे ये कपोल कल्पित अधिकार ।

तू सोचती है,तुझे मांगने पर अधिकार मिलेगा ,
हा पगली ! जो तूने मना किया तो याद रख
अब भी तूझे,ज़िन्दगी झुलसाने का तेजाब मिलेगा ।
रे मुर्ख नारी !
लगी है तू सोचने,कैसे यह मैं भी हूँ सोचता ।
भूल मत,सती बना तुझे जलाया किसने ? मैंने
पहले जन्मजा थी मरती,अब तो बाहर की साँस
भी है दूभर,फिर भी है तू सोचती ।
 तुझे जलाया,रुलाया,तडपाया,मारा
और वासना से मसला किसने ? मैंने

शक की बनाह हुई तो दीवारों पर भी पटका ,
मसालों सा मसला और फिर जितना तेरा
अधिकार, उतने ही छोटे टुकडो में काटने का पुरुषत्व दिखाया ।
फिर भी,तू क्यूँ न है चेतती ?
रे भोग्या ! चेत जा .....
तेरा सम्मान एक ढोंग है ,
तभी तो मेरा परिवार भी है
आज मुझसे सहमा,कल ही मैंने बारह वर्षीया
अपनी बहन को भी था भोगा ।

भारत माता  है तभी तो है बे आबरू
जो मानते इसे पिता तो, बातें कुछ ............


Friday, June 21, 2013

पिता !!

उसे पैदा करते ही उसकी माँ चल बसी।उसने ही उसे पाल-पोष कर बड़ा किया था।उसकी शराब के नशे के बाद जो कुछ अगर कभी बच गया तो उससे उसका पेट भरता।यूँ ही आधा-पूरा खाते हुए उसने नवयौवन को प्राप्त किया।परन्तु उसका व्यव्हार तब भी वैसा ही था।
एक दिन जब वो बाहर से लौटा तो उसके पास शराब की जगह मिठाई थी।और यह रोज का सिलसिला बन गया।तीन सप्ताह बाद वो उसे घुमाने ले गया , और सड़क के किनारे जा बात करने लगा ,उसे लगा वह उनके घुमने की व्यवस्था कर रहा है। फिर वह एक आदमी और बहुत सारे रुपयो के साथ लौटा।उस आदमी ने उसका हाथ पकड़ लिया और फुसलाते हुए उसे जबरन अपनी गाड़ी की ओर ले जाने लगा।उसने घबरा कर उसकी ओर देखा ,पर वह नोट गिनने में व्यस्त था।
थोड़ी देर बाद वो सहमी,रोते से वापस आयी, उसकी आँखो से आंशु भी गायब थे। उसे आता देख वह खुश हो गया और कहा "चल नाटक मत कर, कल फिर आना है "
वह स्तब्ध सी हो सर झुकाए उसके पीछे चल पड़ी।क्यूँकी वो उसका पिता जो था !!