The power of thought

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Saturday, November 3, 2012

अधिकार या बंधन ?

"सिंदूर " एक सुहागन नारी का अधिकार है ,उसकी पहचान,सुहाग का निशान है।सदियों से भारतीय महिलाएं विवाह उपरांत सिंदूर,मंगल सूत्र का प्रयोग करती है,जो उनके विवाहित होने का प्रतीक है और सिर्फ उनपर ही लागु  होता है ,पुरुषों पर नही।परन्तु यह आया कहाँ से?यदि यह उपर वाले का आदेश है तो सिर्फ सनातन धर्मी ही क्यों पालन करें इसका?
यदि,यह सुहाग की ही निशानी है तो सिर्फ नारी ही क्यों?पति के लिए हो या संतान हेतु भूखी सिर्फ नारी ही क्यों? कोख से अगर पुनः लड़की ही जन्मी तो नारी ही क्यों जल मरे?आश्चर्य है की आज  भी अपने प्रेम प्रदर्शन हेतु किसी को भूखा रहना पड़े तो।वो प्रेम ही क्या जो प्रेयसी को तड़पाता रहे।और यदि यह वाकई में प्रेम ही है तो क्या पुरुषों को अधिकार नहीं या उनका कर्त्तव्य नहीं की वो भी अपना प्रेम प्रदर्शित करें? कोई नर अगर करे तो वह आदर्श पति माना जाता है,उसी तरह जैसे कुछेक दयालु अंग्रेज शासकों ने गुलामों के प्रति दयालुता दिखाई।
मुझे जानकारी नहीं और यह स्वीकारने में मुझे हर्ज भी नहीं,परन्तु प्रश्न यह है की यह सारे बंधन महिलाओं पर ही क्यों ?अधिकतर महिलाएं मुझसे सहमत नहीं,उन्हें लगता है यह संस्कृति है पर वह तो सती होने की भी थी।
पुरुष प्रधान समाज में,पुरुष आरोपित मान्यताएं कब तक संस्कृति बन चलती रहेगी? इक्कीसवीं सदी की नारी भी कब तक इस चक्र्व्युःह में फंसती रहेगी ? आखिर कब तक ?







Friday, September 28, 2012

"यह "तालियाँ बजाएगा

इस कदर है क्यूँ सोचता तू?
खुद को उनसे है क्यों तौलता तू ?

उनकी थाली होगी ही लाखों में 
है चिंता तेरी ही बस उनकी ही बातों में 
व्यर्थ ही तू है चिंता में गला जा रहा
उनका विमान तेरे ही लिए तो ,
है सात समंदर पार जा रहा ।

तेरी उन्नति को ही सभाएं होंगी 
जिसमें उनके इर्द-गिर्द परिचारिकाएं होंगी 
तू सोचता है इसमें उनका फायदा है 
"हे मुर्ख! वो तो तेरे सेवक हैं जो तेरे 
सिर्फ तेरे ही तरफ से उन सेवाओं का लुत्फ़ लेते है "

पर हे जालिम,निर्दयी,खुदगर्ज 
तुझे क्यूँ नही हैं उनकी खुशियाँ गंवारा ??
यकीं कर उनकी सुविधाओं का कोई अंश तेरी भी झोली में आएगा 
करदाताओं का कर यूँ ही न थोड़े जायेगा ।

तब तक तू इंतज़ार कर 
अपनी फटी धोती का ही उपयोग कर 
याद रख वो सेवक तू स्वामी है 
भूख,पीड़ा,दरिद्रता का तू ही तो वारिश है 

पर यदि यह तुझे स्वीकार न हो 
कर परिश्रम,उठ बन महान 
शामिल हो ले उन सेवकों संग 

पर याद रख 
"जो तुने भी मुहं मोड़ा तो वो पल भी आएगा 
जब काल की कालिमा से तू खुद  तेरी 
गर्दन नपवायेगा "
और "यह " खड़ा हो 
जोर जोर से नारे लगाएगा और तालियाँ बजाएगा ।।

Thursday, September 20, 2012

"यहाँ पेशाब करना मना है "

भारत के किसी भी शहर में जायें, गाँव या महानगर । किसी भी व्यक्ति से बात कर कुछ समझाने का प्रयास करें वह आपको ऐसी हिराकत भरी नजरों से देखेगा की आपको अपने वजूद पर ही शर्म आ जाये| और यह पूरा ही देश ऐसे विद्वानों से भरा पड़ा है, पर अहम सवाल यहीं खड़ा होता है , जब सब ही इतने समझदार हैं तो फिर क्यूँ समूचा शहर इसे ही महानुभावों से विनती करते तस्वीरों से अटा हुआ है ?
कहने को तो हम संभ्य है परन्तु अगर विचार करें जो जो सबसे ज्यादा विनती करता हुआ निवेदन है (जिसे कहीं कहीं देख कर ऐसा लगता है की अब उदारवादी धड़े से गरमपंथी अलग हो चुके है )
-"यहाँ पेशाब करना मना है " मैं आपसे शर्त लगा कर कह सकता हूँ की आप समूचे उत्तर भारत का भ्रमण कर आओ और एक भी ऐसा शहर खोज निकालो जहाँ यह विनती चस्पाई न गयी हो । "यहाँ थूकना मना है" यह साथ ही साथ प्रतिस्पर्धा करता हुआ पाया जाता है गोया मानों इंसानों में यह होड़ लगी हो हम थूक कर अपने मुखारविंद से इस शहर को खूबसूरत बना सकता हूँ या,,,,,,,,,समझ तो आप गए ही होंगे ।
"अपनी जान की चिंता कर हेलमेट पहन कर चल " "सीट-बेल्ट बांध कर यात्रा करें " यह भी कुछ महसूर होते जुमलों में शुमार होते जा रहे है । परन्तु मजाल है की हमारे कानो में जूं तक रेंग जाये। अब अगर ऐसे निवेदनो से ही मैं बातें मानना शुरू कर दूँ तो फिर हमारे शहर को ऐसे अनूठे जुमलें कहाँ से पढने को मिलेंगे । कुछ ऐसा ही विचार शायद हमारे बुद्धि वाले मित्रों का हो गया है शायद ।
 लेकिन इसमें हमारे जैसे नासमझों का ही सबसे ज्यादा नुकसान होता है ....कभी अगर किसी शोर्ट-कट के चक्कर में कोई गली पकड़ ली तो हो जाती है हमारी छुट्टी। मुझें याद है बचपन में मेरे दोस्त महावीर का चुनाव कुछ इसी तरह से करते थे "कौन सबसे ज्यादा देर तक इस गली में रह सकता है ""कौन उस कोने में खड़ा हो सकता है "
मेरे पुराने शहर में एक गली थी जिसका असली नाम तो शायद मुझे याद भी नहीं पर इतना याद है हम उसे "पेशाब वाली गली " कहा करते थे,क्यूँ ? क्युकी वो उसका खुला ऐलान था मेरे 100 मीटर के दायरे में से भी शांति पूर्वक गुजर कर तो दिखाओ ।
वो दिन बीते ,मैं पटना ,दिल्ली ,मुंबई घूम आया पर  ये जुमला मेरा पीछा करता ही रहा । अब मैं सोच रहा हूँ क्या कभी भी ऐसा कोई शहर विकसित होगा यहाँ जहाँ यह विनती न पढने को मिले "यहाँ पेशाब करना मना है"