The power of thought

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Tuesday, June 19, 2012

सही बात

वह एक गरीब,मेधावी नहीं परन्तु परिश्रमी छात्र था । अपने माता-पिता की तीन संतानों में सबसे बड़ा । दसवीं की परीक्षा में उसे सत्तर फीसदी अंक हासिल हुए। आगे पढ़ाने की चाह में उसके पिता ने अपनी आधी जमीन  गिरवी रख ऋण लिया और उसे महाविद्यालय भेजा ।
प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर भी उसे कहीं रोजगार न मिला । माता-पिता के सपने धुंधले होने लगे।किसी दिन वह कहीं जा रहा था तभी उसने देखा एक घर में आग लग चुकी है अपने साहस  का परिचय देते हुए वह उस आग में छलांग  अंदर फंसे बच्चे को बाहर निकल लाया । लेकिन एक चिंगारी उसकी आँख में चली गयी ।
कुछ दिनों बाद उसका सम्मान समारोह था । वक्ता ने उसकी प्रशंसा करते हुए नकद पुरस्कार की घोषणा की साथ ही उसकी आँखों के उपचार की भी ।
वह वक्ता के कान  में फुसफुसाया "आँख रहने दो एक आँख चली जाएगी परन्तु नौकरी तो मिल जाएगी "
वक्ता को सांप सूंघ गया। पर उसकी बात भी सही थी । भयावह रूप से ही सही पर सही तो थी ही ।
लेकिन क्यूँ?

Tuesday, May 15, 2012

दो शब्द खुद से

स्तब्ध हूँ ,
अपनी ही जमीं पर  पिंजरे में कैद हूँ अभी 
इस  कैद  से बाहर निकलूँ  कैसे 
इसी उधेड़बुन में व्यस्त हूँ अभी 

30 करोड़ भुजाओं वाली 
इस  माँ को गुलाम  बनाया कैसे ?
यूँ लगता हैं जंगल  में मेमनों ने 
शेर को पकड़ कर घंटी पहना दी है ।

हाथों में अभी शक्ति नहीं 
पर हुआ मैं भी अभी निर्बल नहीं 
घुप्प अँधेरा छाया  है 
पर आँखों के अंदर मेरी अभी भी रौशनी है ।

गिरा जरुर हूँ 
पर उठ खड़ा होऊंगा 
दोनों हथेलियों में अनंत इस 
ब्रम्हांड के दो छोर पकडे हूँ खड़ा मैं 




Saturday, May 12, 2012

कसाब का न्याय

"भले ही सौ कसूरवार छुट जाये परन्तु एक  बेकसूर को सजा नहीं मिलनी चाहिये " न्याय  के इस  अनूठे सिद्धांत पर कार्य करती है हमारी न्याय पालिका और भारत  जो प्राचीन  काल  से ही अपनी उदारता के लिए जाना जाता है आज एक अपराधी के लिए अपने आदर्शो से कैसे मुहं मोड़ सकता है ?यही तो वो गुण  है जो भारत  को अनूठा बनाता  है । सोचिये जरा कितनी अनूठी है ये प्रथा "जो विदेशी हमला करने आया था जब उसे न्यायपूर्ण  सजा दिलाने में यकीन रखती  है तो अपने देश के निर्दोष लोगो से कितनी उदारता से पेश आती  होगी "। जरा सोचिये पुरे विश्व में भारत की क्या छवि निर्मित  हुई होगी ?
कसब गुनाहगार है,आज नहीं तो कल  सर्वोच्च  न्यायालय  उसे सजा सुना ही देगा । पर उसे दण्डित करने की आपाधापी में हम  क्यूँ अपने हाथ  और कपडे गंदे करे ?अस्तु हमें अपने न्यायप्रणाली पर यकीन  तो करना ही चाहिये जो विश्व की सर्वोत्तम  हैं क्यूँ की न्याय संगत  है तो हो कर ही रहेगा और यदि नहीं हुआ  तो वो न्याय  ही नहीं और हमारी न्यायप्रणाली न्याय  करने के लिए ही निर्मित और जानी जाती है ।
जरा सोचिये एक  को जल्दबाजी से दण्डित  कर  दिया  गया तो क्या उसके उपरांत  यहाँ एक  नयी प्रथा ही प्रारंभ  नहीं हो जाएगी जिसमे हो सकता है की  हजारों मुजरिमों को दण्डित  कर  दिया  जाये पर इस  सम्भावना को नकारने की हिम्मत  भी कोई नहीं करेगा की ये 2-4 निर्दोषों की बलि भी ले लेगी । यदि हममें से हर कोई जज  बन  फैसला सुनाने ही लगा तो वो अराजकता फैलेगी जो थामे न  थमेगी ।
 अतः प्रभु  नाम  स्मरण  कीजिये और कसाब  को सजा मिलने तक  इंतज़ार कीजिये ।और हाँ अपने न्यायालयों पर  विश्वास  बनाये रखें क्यूँ की जैसा मैं पहले भी कह चूका हूँ 
"न्याय संगत  है तो हो कर ही रहेगा और यदि नहीं हुआ  तो वो न्याय  ही नहीं"