The power of thought

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Saturday, October 2, 2010

भारत के अंत की झलक

आख़िरकार 60 वर्षो की मुकदमेबाजी के बाद अदालत ने राम-जन्म भूमि के मामले मे अपना फैसला सुना दिया और जैसी आशंका थी यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का धर्मनिरपेक्ष  फासिला रहा | जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट  से साफ़ हो गया था की विवादित स्थल वास्तविकता मे 1 मंदिर ही था तो फिर उसके  बाद असमंजस कैसा ? जहाँ करोडो लोगो की आस्था जुडी हो उसका फैसला करने मे विलम्ब  कैसा , वेग भी जब वह  आस्था न्यायसंगत हो ? स्पष्ट है की मुस्लिम हिन्दू बंधुओ को इस पर प्रसन्नता ही हुई होगी की जब उनका दावा ख़ारिज हो गया था उसके बावजूद उन्हें 1 /3 जमीन प्राप्त हो गयी |
                                मेरे कई मित्र व सम्बन्धी मुझसे 1 सवाल पूछते  है " आख़िरकार मंदिर-मस्जिद पर इतना हल्ला क्यों ? क्यों न अपने मुस्लिम हिन्दू भाईयों को ही जमीन दे दी जाये ?" वैसे सभी लोगो को मेरा 1 ही उत्तर है "विवाद मंदिर का नही , उपासना स्थल का बाद मे , यहाँ राम-लाला की जन्मभूमि का मसला है | नमाज कही भी पड़ी जा सकती है , वह या 1 किमी दूर भी , परन्तु जन्मस्थान तो 1 इंच भी खिसकने के बाद अपनी महत्ता खो बैठता है | इस मसले को वो सभी लोग  समझ सकते है जिन्हें अपने घर  से प्रेम है जहाँ उनका जन्म हुआ , उस  कलम से प्रेम है जो उनके सबसे प्रिय शिक्षक ने सिर्फ उन्हें ही दिया , उस कमरे से प्रेम है जहाँ उनकी संतानों का जन्म हुआ , जहाँ उनके माता-पिता का देहावसान  हुआ | लेकिन अगर आप मे यह प्रेम नही तो आप इस आस्था को महसूस नही कर सकते |
                            वैसे भी, बाबर कोई महापुरुष या संत तो था नही , था तो वह  1 आक्रमणकारी ही | यह भी विचारणीय है की कोई भी विदेशी आक्रान्ता अपने परिवार के साथ यहाँ नही बसा , बाबर से पहले | तो यह तो स्वत: स्पष्ट है की भारतीय हिन्दू मुस्लिमो के पूर्वज भी पूर्व मे सनातनी हिन्दू ही थे जिनके आराध्य नि:संदेह श्री राम होंगे | अतः राम पर प्रश्न उनके द्वारा उनके पूर्वजो का भी अपमान  है|
               आजकल 1 बात और कही जा रही है  की आज का भारतीय इस मसले से उपर उठ चूका है तो वास्तविकता यह है की आज  का भारतीय उपर नही उठा बल्कि उदासीन व निष्क्रिय हो गया है जो आज अपने राष्ट्र व देश पर मंडराते खतरे पर भी चुप बैठा है अतः ये उसकी परिपक्वता नही अपितु अपरिपक्वता की ही निशानी है जो पुनः राष्ट्रघाती है , जैसा की मैंने अपने  पिछले ब्लॉग मे भी कहा है |
                अंत मे सबसे प्रमुख बिंदु , तीनो माननीय न्यायधीशों ने मन की विवादित स्थल ही राम जन्मभूमि है फिर भी उन्होंने 2 -1  से सुन्नी वक्फ बोर्ड को 1/3 हिस्सा दिया | पूरे भू-खंड को 3 हिस्सों मे बांटने का उनका फैसला यक़ीनन अंग्रेजो की याद दिलाता है जो आपाधापी मे भारत को टुकड़ो मे बाँट  गए थे और जिसकी टीस आज भी राष्ट्रवादियो को सालती है | पर विचारणीय बिंदु यह है की क्या अदालत का यह फैसला तब भी आता अगर वह सुन्नी वक्फ बोर्ड की जीत होती ?




              कहीं , यह भारत के अंत की 1 झलक तो नही ? क्योंकि जो राष्ट्र अपनी संस्कृति की रक्षा करने मे अक्षम है वह  विश्व के मानचित्र मे बने रहने मे सक्षम कैसे हो सकता है

Thursday, September 30, 2010

मेरे प्रश्नों का जवाब

भारत, 1 ऐसा देश जो हमेशा से ही विविधिता में एकता का प्रतीक रहा है  और जिसका हर भारतीय को गर्व भी है | परन्तु इस गर्व की सीमा क्या होनी चहिये ? आज वो वक़्त सामने है जिसपर हम सभी को विचार अवश्य करना चहिये | कल इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा राम जन्म-भूमि का फैसला आएगा,जिस के बाद क्या होगा ये कोई नही जानता, में भी नहीं ..पर मैं 1 बात अवश्य जानता हूँ  की इस फैसले के बाद , चाहे वह फैसला किसी के भी पक्ष मे आये लोगो मे 3 तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलेंगी 

  1. जय श्री राम (सकारात्मक)  
  2. अल्लाह हो अकबर (नकारात्मक)
  3. हमें क्या फर्क पड़ता है , कुछ भी बने हमें क्या(विध्वंसात्मक)
इसी विचार ने हमारे राष्ट्र का लगभग सर्वनाश ही कर दिया |आश्चर्य की बात नही इसी उदासीनता ने हमारे देश को इतना पीछे धकेल दिया , हम जगद्गुरु से 1 विकासशील देश की श्रेणी मे आ गए | खिलजी के पास मात्र 12 सहयोगी थे , जबकि विश्वविद्यालय मे कुल 10000 सिर्फ छात्र थे , जिनकी मौजूदगी मे विश्वविद्यालय को खंडहर बना दिया गया और सभी देखते रह गये | कहते है विश्वविद्यालय का पुस्तकालय आग लगाने के बाद 6 माह तक धू-धू कर जलता रहा , जिसके साथ जल गयी हमारी संस्कृति , होम हो गया हमारा गौरवशाली इतिहास |
                 लेकिन जो 1 प्रश्न  सोचने पर मजबूर करता है "जब वह पुस्तकालय 6 माह तक जलता रहा तो किसी भी शासक ने उसे बचाने की उसकी आग बुझाने   की कोशिश नही की ? क्यों?
              अगर मानचित्र देखे तो पायेंगे इंग्लैंड का क्षेत्रफल हमारे ही 1 राज्य राजस्थान से भी बड़ा नही, वहाँ से मात्र 1 लाख अंग्रेज आये और हम ३३ करोड़ हिन्दुस्तानियों को ग़ुलाम बना कर मसल दिया | जालियावाला  बाग जैसे भीषण व क्रूरतम नरसंहार किये और हम किसी नेता व चमत्कार की प्रतीक्षा करते रहे |
             13 -अप्रैल-1919 को अंग्रेजो ने तो सिर्फ आदेश दिया था  (जालियावाला  बाग) पर गोलियां चलने वाले हाथ तो हिंदुस्थानी ही थे, यह वाकई मे आश्चर्यजनक  है की क्यों अपने ही भाईयों के सीने को छलनी करते हुए उनके हाथ क्यों नही कांपे ? 
    अब ये निष्क्रियता की पराकाष्ठा  हो ही गयी है , ये हम सभी जानते ही फिर भी चुप बैठे है , क्यों? ये हम सभी जानते है की विश्व की बड़ी-बड़ी सभ्यताएं अपने नागरिको की निष्क्रियता से ही नष्ट हो गयी , फिर भी हम चुप बैठे है आखिर क्यों ? क्यों?
क्या हम चाहते है की हमारी सभ्यता भी नष्ट होकर सिर्फ इतिहास के पन्नो मे ही देखने को मिले ? यदि हां , तो हम खुद को इंसान कैसे  कह सकते हैं ? और यदि नही , तो हम अभी तक चुप क्यों बैठे है? क्यों? 
  अगर अब भी हम नही चेते तो .....................
क्या मेरे प्रश्नों का कोई जवाब है ?

Wednesday, September 22, 2010

आखिर कब तक

हिन्दुस्थान, मेरा देश | यहाँ मैं पैदा हुआ, दुनिया देखी, दोस्त बनाये , सपने संजोये और उन सपनो को पूरा करने का दम भरते हुए कोशिश भी की | इस दुनिया के हर माँ-बाप के तरह मेरे माता-पिता भी यही चाहते है की उनका बेटा काफी सफल इंसान बने , उसका  काफी नाम  हो, क्या गलत चाह लिया उन लोगो ने , कुछ भी नही फिर भी कही न कही कुछ तो कमी रह ही गयी : मेरे अंदर जो की मैं उन  सपनो को पूरा करने के बजाय रोज के रोज एक नया सपना संजोने लगा | मैं भूल गया था की मैं उस देश का बेटा हूँ ...जहाँ  गरीबो के बच्चों को सपने देखने का कोई हक नही , जहाँ पिज्जा  के दाम तो कम होते जा रहे है मगर दवाईयों के बड़ते जा रहे है , जहाँ  सांसद तो अच्छा खासा वेतन ले सकते है मगर एक पुलिस हवलदार नही , जहाँ  सबको अपने वोट-बैंक की तो परवाह है मगर अपने वोटर्स की नही , जहाँ  लोग देश से बाहर जा रहे विद्वानों पर टिका-टिप्पणियां तो आराम से कर सकते है मगर उन्हें अपने ही देश मे वैसी सुविधाए नही दे सकते जिस से की उन्हें देश छोड़ कर जाने की जरूरत  ही न महसूस हो |
                     यही व्यथा हर 1 उस बच्चे के मन मे होती है जो कुछ करना तो चाहता है मगर सिस्टम के हाथो मजबूर हो जाता है , सपने हर कोई देखता है और उनको पूरा करने की कोशिश  भी करता है मगर आधे से ज्यादा ख्वाब तो इस भ्रष्ट सिस्टम के हाथो मे ही दम तोड़ देते है | क्या इस देश के ही संतान होने के नाते ये हमारा ही दायित्व नही की हम अपने उन देशवासियों के ख्वाबो की पूरा करने मे मदद करे आखिर कब तक कोई एकलव्य अपना अंगूठा कटवाता रहेगा ? और कब तक पूरा समाज धृतराष्ट्र बना बैठा रहेगा ?....आखिर कब तक ............????