The power of thought

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Monday, January 6, 2014

वेश्या

वह चलती है इतराती सी 
इठलाती , मदमाती सी । 
छिड़ती , नित ही जाती है ,
दिलफेकों कि आवारगी , वो 
हँस हँस सहते जाती है ॥ 

वो रोज ही घर से जाती है 
औ अहले सुबह ही आ पाती है । 
धंधे पे उसके आपत्ति है 
इन कर्णधार रखवालों को ,
क्योंकि , वो लाज़ बेच सुख पाती है ॥ 

लेकिन बेच खुद को ही तो 
पाल , परिवार वो अपना पाती है । 
गो खुद को वो समझाती है कि ,
जो रहना जिन्दा मज़बूरी है तो 
कुछ भी करना पड़ता है ॥ 

लेकिन पथरायी , नुंचायी देह की 
वह रूह सवाल कर जाती है  ,
"जो देह बेचने पर अधिकार नहीं तो ,
खरीदने पर , है क्यों सम्मान यहाँ" ??

वह देह नुचवाते जाती है 
और पेटों को भरते जाती है ।
आँखों में उपहास भर वो 
हम सब को देखती जाती है  
और पूछने पर नाम , खुद को 
वो "वेश्या " बतलाती है  ॥

Tuesday, December 24, 2013

अवसर

उस जंगल में आया वो नया जानवर था ,जो खुद के ईमान कि दुहाई देता हुआ व जंगल को बदलने का दावा करता आया था । बाकि जानवरों ने उस पर ध्यान नही दिया और वह भूखा ही नारे लगाते हुआ भटकने लगा । दस  दिनों बाद शेर उसके सामने से गुजरा उसकी भूखी आँखों को देख शेर को अपनी कुर्सी सुरक्षित रखने का एक उपाय समझ आया औरवह उसकी ओर अपना जूठा फेंक चलता बना । पंद्रह घंटों के इन्तेजार का बाद उसने यहाँ देखा , फिर वहाँ और जूठी रोटी खाने में लग गया । 

Thursday, September 19, 2013

कौन

हर दिन, हर पल हर सांस 
अब बस आता एक सवाल है 
कि मैं तेरा व तू मेरी कौन है ?

तू मेरी कौन यह जानता हूँ ,
इस संसार को हूँ सकता बतला कि 
तू मेरी जान ,मेरा विश्वास मेरा अभिमान है । 
मैं रण में मूर्छित लक्ष्मण ,तू 
मेरे प्राण वो संजीवनी है । 
मैं रेत पर तड़पती मछली , व 
मेरी तू ज़िन्दगी वो पानी है । 
अब भटकता मैं शरीर , मेरी तू रूह है । 
जिसे हूँ मैं चाहता, तू ही मेरी वह महबूब है । 
मैं हूँ सा एक सुहागन ,मेरा तू श्रृंगार है । 

फिर भी है मेरा दिल पूछता मुझसे,
"बता वो तेरी कौन है ?"

तब कहता हूँ उससे कि ,जैसे 
ग्रहों को सूर्य,वर्षा को मेघ व् जीवन को जल 
अनिवार्य है , ठीक वैसे ही 
"मेरे इस जीवन का अब तू आधार है । "
पूछता फिर वो नादान है कि तो 
"मैं तेरा कौन हूँ " जो बता पाना आसान है 
उसे हूँ समझाता कि 
"वो चाँद मैं उसका चकोर, वह आग मैं पतंगा हूँ  । 
है वो शमा मैं परवाना , वह धूल और मैं बूंद हूँ  । 
वह तितली मैं फूल , वह कमल मैं गुंजायमान हूँ । 
मैं जीवन वह सांस , वह ऋचा और मैं उसका पाठ हूँ  । "

अब वो है जानता की तू मेरी कौन है 
लेकिन बात ये अब भी रही अधूरी है ,क्युकी 
मेरी ज़िन्दगी में बाकी अब भी 
लिखी जानी , तेरी कहानी है ॥