The power of thought

The power of thought

Saturday, August 10, 2013

खुद से ज्यादा

नहीं जानता मैं , की क्या है तू जानती 
लेकिन चाहता तुझे ही , अब तो हर वक़्त हूँ  । 
और ये कविता भी तो 
बस तुझे समझाने का एक बहाना है । 

चाहता तेरे हूँ संग कहीं जाना 
कभी हो खाना तो कभी घूमना 
पर मकसद ये हरगिज़ नहीं, ये समझ ले 
हूँ चाहता संग तेरे बस कुछ पल बिताना ॥ 
हूँ चाहता तेरी ज़िन्दगी के तेरे ही कुछ खास 
 पल चुरा लूँ ,और चुरा उन्हें अपना
 बस अपना बना लूँ ॥ 

 हूँ चाहता तुझे मैं देखना 
देखना तुझे जब तू हँसे ,उंगलियों से 
अपनी लटों से खेले , देखू तुझे जब तू होंठ भींचे 
जब तू अपने नयन समेटे 
या जब कमलों सा उनको हौले से खोले ,
चाहता हूँ बनना ,मैं चोर उन पलों का 
जिन पर सिर्फ तेरा ही अधिकार है ॥ 

जानता हूँ यह भी , की तू खास है 
जोकि आशिक बना तेरा खुदा भी आज है 
मेरा नही कोई वजूद है ,लेकिन 
 प्रेम ही जो सिर्फ बात हो 
तो कर यकीं की 
खुद से ज्यादा, चाहा है तुझको ॥ 


Friday, August 9, 2013

"वेदों की सूक्तियाँ "

सत या असत , झूठ या सांच 
माने तू या माने न मेरी ये बात 
पर सिर्फ तेरी ही सोचूं मैं अब दिन और रात । 
याद  क्यूँ है तेरी हर वो बात,
शायद हुआ हूँ पागल या हो गया बावरा 
री पर, बोल इसमें मेरा कसूर क्या ?

तू है इत्ते पास मेरे की   
हूँ वाकई , मैं बस सोचता … 
पाप था या पुण्य जो तुझो मिला 
जो मिली तू तो वह पुण्य था 
जो खोयी अब सी हो दुभाग । 
 नहीं चाहता हूँ तुझे,किसी और से बाँटना 
लगता माना खुदगर्ज हूँ ,पर तो 
री ,इसमें मेरा कसूर क्या ?

मेरी शंका निर्मूल हो यह चाहता है प्रेम मेरा 
तो हो मेरी सिर्फ, है मांगता अब दिल मेरा । 
देखा नही खुदा था , सिर्फ धुआं जलाता था 
पर भेज तुझे उसने मंत्र भी गँवा दिए 
अब तो है मेरी  पनाह मांगती 
हर वक़्त तू ही तू …बस तू है 
"वेदों की सूक्तियों " सी गूंजती  

Tuesday, August 6, 2013

निवेदन : प्रेम का

शायद जो है तुझे पाया आधा 
वो खोने का पूरा डर सताता है 
तभी 
रात इस वक़्त भी 
हूँ मैं कुछ खोजता सा । 
अब तो आधी नींद भी 
है क्यूँ गायब तू ये बता ,
शायद तुझे खोने का है वो डर । 

है मन में तेरे क्या 
ये तो  नहीं मैं जानता 
सो खुद खुदा ख्वाबों में तेरे 
आ कर दे बयां , हूँ यह चाहता 
करूं क्या वे कहूँ क्या 
अब तक हूँ यह ही सोचता 
क्यूंकि तुझे मैं खोना नही हूँ चाहता ॥ 

दोस्ती से आगे तेरे तैरने को हूँ बढ़ा 
पर रे ,इस नौका की पतवार तू ही चला 
चला पतवार अब ये नाव अटकती है 
कुछ तो बोल दे के ये साँसे अटकती है 

यह प्रसंग पहली हूँ लिख रहा 
जो तू समझे मानो हो दिलबरा ॥