The power of thought

The power of thought

Tuesday, December 18, 2012

"मैं चुप रहूँगा "


जो हो शराबा शोर का
बाजुओं के जोर का
क्रंदना सी झंकार का
तिलमिलाती सीत्कार का
"मैं चुप रहूँगा "

लुट रही हो चाहे कोई
खो कर  अपनी आबरू
न हुआ हूँ न मैं हूँगा
न होगा कोई आज उससे रूबरू
हर किसी का बलात्कार हो
इक या चाहे हजार हो
"मैं चुप रहूँगा "

नग्नता स्वीकार है
चाहे हो मच रहा सीत्कार है
वासना के किस्से सुनूंगा
बस तो फिर भी बस ही है
खुली सड़क का इंतज़ार है
उस सड़क पर मैं भी रहूँगा
हा हा  दिल्ली मैं भी करूंगा
लेकिन न भूलना इस बात को की
"मैं चुप रहूँगा "


Saturday, December 8, 2012

ह्रदय ह्रदय की दशा

घमंड हमेशा ही बुरा ही नहीं होता । 
विश्व के कुछ सबसे ज्यादा घमंडी लोगो का क्या हश्र हुआ ये सुने व पढ़े ।

रावण                 - बैकुण्ठ धाम 
कंस                    - बैकुण्ठ धाम 
हिरण्यकश्यप      - बैकुण्ठ धाम 
महिषासुर            - बैकुण्ठ धाम 
हिरण्याक्ष             -बैकुण्ठ धाम 

परन्तु जो "सरल ह्रदय" थे,उनका  क्या हुआ ?

विभीषण           - आज तक जीवित 
जाम्बवंत           - पता नहीं 
सुग्रीव                - पता नहीं 
विदुर                 - पता नहीं
परिक्षित             - सांप ने काट लिया 
हरिश्चंद्र              - राज पाट खोया,परिवार भी(बाद में हासिल दोनों ही हुए परन्तु क्या फायदा )

अतः यह आपका  स्वंय का निर्णय है की आपको क्या करना है व क्या बनना है ।


* शर्ते एवं  नियम लागु ।

Wednesday, December 5, 2012

किसकी प्रगति ,कैसी प्रगति

भारत की छवि आज  विश्व के सबसे तीव्र गति से विकास करने वाले राष्ट्र की है जो अपनी तकनीकी खूबियों के लिए जग-प्रसिद्ध हो रखा है । और एक भारतीय होने के नाते ये एहसास दिल को गुदगुदाने वाला ही होता है जब पता चलता है की हमारा देश एक मूल्य-प्रधान राष्ट्र है। जिस पश्चिम को हम बचपन से ही लालची समझते आये है जब यह देखते है की वो न्याय के आदर्शों का पालन कर रहा है वाकई में तो यह एहसास अलग सा ही होता है । हिल्टन हो या गुप्ता या हालिया ही कारावास की सजा पाए एक देश के प्रधानमंत्री,जो अपनी लालच के लिए जाना जाता है वही न्याय कर रहा है न की वो जो अपने आदर्श,न्यायिक मूल्यों के लिए जाना जाता है । यहाँ तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जाने वालों को ही सजा होगी । 
किसी तकनीक को बेचना तो जानते है हम परन्तु उसे ईजाद करने का रास्ता भूले बैठे है । सबसे सस्ती कार तो बना सकते है परन्तु पहली कार नहीं । क्या वजह हो सकती है की हम जो सस्ता "आकाश " जमीन पर लाने  की सोचते है तो वो भी एक षड़यंत्र का शिकार हो जाता है । अपने ही पेंशन को पाने को अपने ही  पढाये शिष्यों को रिश्वत देनी पड़े,यह सिर्फ अज के भारत में ही हो सकता है । 
न हम करना चाहते  है न ही सीखना,यही तो वजह हो सकती है ही हमारे धनकुबेरों ने बफेट को दान की सीख न देने की चेतावनी दी वो भी सरेशाम। अमेरिका जैसे धन के लोभी देश से हमे कम से कम अज एक चीज़ तो सिखने की जरुरत है ही ,किस तरह एक छब्बीस वर्षीय नवयुवक सबसे युवा अरबपति बन सकता है और उसी उम्र में अपनी आधी सम्पदा दान कर सकता है । यहाँ तो लोग राडिया टेप के बाहर आने से परेशान हो जाते है न की उसमें की गयी बातचीत से । 
जब तक मूल्यों को खाद न दिया जाये तब तक हम सिर्फ भारत की सिलिकॉन वैली बना सकते है पहली नहीं ।