The power of thought

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Saturday, December 8, 2012

ह्रदय ह्रदय की दशा

घमंड हमेशा ही बुरा ही नहीं होता । 
विश्व के कुछ सबसे ज्यादा घमंडी लोगो का क्या हश्र हुआ ये सुने व पढ़े ।

रावण                 - बैकुण्ठ धाम 
कंस                    - बैकुण्ठ धाम 
हिरण्यकश्यप      - बैकुण्ठ धाम 
महिषासुर            - बैकुण्ठ धाम 
हिरण्याक्ष             -बैकुण्ठ धाम 

परन्तु जो "सरल ह्रदय" थे,उनका  क्या हुआ ?

विभीषण           - आज तक जीवित 
जाम्बवंत           - पता नहीं 
सुग्रीव                - पता नहीं 
विदुर                 - पता नहीं
परिक्षित             - सांप ने काट लिया 
हरिश्चंद्र              - राज पाट खोया,परिवार भी(बाद में हासिल दोनों ही हुए परन्तु क्या फायदा )

अतः यह आपका  स्वंय का निर्णय है की आपको क्या करना है व क्या बनना है ।


* शर्ते एवं  नियम लागु ।

Wednesday, December 5, 2012

किसकी प्रगति ,कैसी प्रगति

भारत की छवि आज  विश्व के सबसे तीव्र गति से विकास करने वाले राष्ट्र की है जो अपनी तकनीकी खूबियों के लिए जग-प्रसिद्ध हो रखा है । और एक भारतीय होने के नाते ये एहसास दिल को गुदगुदाने वाला ही होता है जब पता चलता है की हमारा देश एक मूल्य-प्रधान राष्ट्र है। जिस पश्चिम को हम बचपन से ही लालची समझते आये है जब यह देखते है की वो न्याय के आदर्शों का पालन कर रहा है वाकई में तो यह एहसास अलग सा ही होता है । हिल्टन हो या गुप्ता या हालिया ही कारावास की सजा पाए एक देश के प्रधानमंत्री,जो अपनी लालच के लिए जाना जाता है वही न्याय कर रहा है न की वो जो अपने आदर्श,न्यायिक मूल्यों के लिए जाना जाता है । यहाँ तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जाने वालों को ही सजा होगी । 
किसी तकनीक को बेचना तो जानते है हम परन्तु उसे ईजाद करने का रास्ता भूले बैठे है । सबसे सस्ती कार तो बना सकते है परन्तु पहली कार नहीं । क्या वजह हो सकती है की हम जो सस्ता "आकाश " जमीन पर लाने  की सोचते है तो वो भी एक षड़यंत्र का शिकार हो जाता है । अपने ही पेंशन को पाने को अपने ही  पढाये शिष्यों को रिश्वत देनी पड़े,यह सिर्फ अज के भारत में ही हो सकता है । 
न हम करना चाहते  है न ही सीखना,यही तो वजह हो सकती है ही हमारे धनकुबेरों ने बफेट को दान की सीख न देने की चेतावनी दी वो भी सरेशाम। अमेरिका जैसे धन के लोभी देश से हमे कम से कम अज एक चीज़ तो सिखने की जरुरत है ही ,किस तरह एक छब्बीस वर्षीय नवयुवक सबसे युवा अरबपति बन सकता है और उसी उम्र में अपनी आधी सम्पदा दान कर सकता है । यहाँ तो लोग राडिया टेप के बाहर आने से परेशान हो जाते है न की उसमें की गयी बातचीत से । 
जब तक मूल्यों को खाद न दिया जाये तब तक हम सिर्फ भारत की सिलिकॉन वैली बना सकते है पहली नहीं ।

Saturday, November 3, 2012

अधिकार या बंधन ?

"सिंदूर " एक सुहागन नारी का अधिकार है ,उसकी पहचान,सुहाग का निशान है।सदियों से भारतीय महिलाएं विवाह उपरांत सिंदूर,मंगल सूत्र का प्रयोग करती है,जो उनके विवाहित होने का प्रतीक है और सिर्फ उनपर ही लागु  होता है ,पुरुषों पर नही।परन्तु यह आया कहाँ से?यदि यह उपर वाले का आदेश है तो सिर्फ सनातन धर्मी ही क्यों पालन करें इसका?
यदि,यह सुहाग की ही निशानी है तो सिर्फ नारी ही क्यों?पति के लिए हो या संतान हेतु भूखी सिर्फ नारी ही क्यों? कोख से अगर पुनः लड़की ही जन्मी तो नारी ही क्यों जल मरे?आश्चर्य है की आज  भी अपने प्रेम प्रदर्शन हेतु किसी को भूखा रहना पड़े तो।वो प्रेम ही क्या जो प्रेयसी को तड़पाता रहे।और यदि यह वाकई में प्रेम ही है तो क्या पुरुषों को अधिकार नहीं या उनका कर्त्तव्य नहीं की वो भी अपना प्रेम प्रदर्शित करें? कोई नर अगर करे तो वह आदर्श पति माना जाता है,उसी तरह जैसे कुछेक दयालु अंग्रेज शासकों ने गुलामों के प्रति दयालुता दिखाई।
मुझे जानकारी नहीं और यह स्वीकारने में मुझे हर्ज भी नहीं,परन्तु प्रश्न यह है की यह सारे बंधन महिलाओं पर ही क्यों ?अधिकतर महिलाएं मुझसे सहमत नहीं,उन्हें लगता है यह संस्कृति है पर वह तो सती होने की भी थी।
पुरुष प्रधान समाज में,पुरुष आरोपित मान्यताएं कब तक संस्कृति बन चलती रहेगी? इक्कीसवीं सदी की नारी भी कब तक इस चक्र्व्युःह में फंसती रहेगी ? आखिर कब तक ?