The power of thought

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Sunday, July 8, 2012

दान

राष्ट्र उत्थान हेतु,
था लगा कुबेरों का मेला 
वहां आ पहुंचा एक भिखारी लिए अपना थैला मटमैला ।
नब्बे फीसदी दान करने वाले 
बड़े कुबेर ने थी ज्यों अपनी आँखे तरेरी,
छोटे सभी कुबेरों ने उस गरीब की बाँहें मरोड़ी 
"अब यहाँ ऐसा क्या बचा जो तू देगा,
या तू यहाँ से भी भीख ही लेगा "

निर्धन उस भिखारी ने खोल थैला 
सौंप दिया अपना कलेजा ।
उसकी वहीँ मौत हो गयी 
धनकुबेरों की शाम ने न आयी कोई परेशानी 
भारतमाता के कलेजे में एक फांस हो गयी ।।


Tuesday, July 3, 2012

लेकिन .....आज

माँ की लोरियां 
पिता की झिडकियां 
दादा-दादी की कहानियां 
और दीदी की चुराई मिठाइयाँ 
अब आज याद आती हैं ।।

स्कूल से भाग दोस्तों संग 
बाग जा जामुन चुराना,
नदी में जा गोते लगाना 
पर्वतों पर दौड़ना 
और सिनेमाहाल में दस की खरीद 
बीस की सीट पर बैठ देखना ,
अब आज याद आते है ।।

रात में छत पर बैठ 
भूतों से डरना,आपस में लड़ना 
दूध से भरे ग्लास को नाली में देना 
बिल्लियों को देख खुद में दुबकना 
और किसी की आहट सुन झट से सो जाना 
अब आज वो याद आते हैं ।।

चलो आज बीते कल में चलते हैं 
फिर से किसी को ठगते हैं 
मछलियों संग डुबकी लगा 
बादलों संग उड़ जाते है ।
लेकिन .....आ!!!!!!

Tuesday, June 19, 2012

सही बात

वह एक गरीब,मेधावी नहीं परन्तु परिश्रमी छात्र था । अपने माता-पिता की तीन संतानों में सबसे बड़ा । दसवीं की परीक्षा में उसे सत्तर फीसदी अंक हासिल हुए। आगे पढ़ाने की चाह में उसके पिता ने अपनी आधी जमीन  गिरवी रख ऋण लिया और उसे महाविद्यालय भेजा ।
प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर भी उसे कहीं रोजगार न मिला । माता-पिता के सपने धुंधले होने लगे।किसी दिन वह कहीं जा रहा था तभी उसने देखा एक घर में आग लग चुकी है अपने साहस  का परिचय देते हुए वह उस आग में छलांग  अंदर फंसे बच्चे को बाहर निकल लाया । लेकिन एक चिंगारी उसकी आँख में चली गयी ।
कुछ दिनों बाद उसका सम्मान समारोह था । वक्ता ने उसकी प्रशंसा करते हुए नकद पुरस्कार की घोषणा की साथ ही उसकी आँखों के उपचार की भी ।
वह वक्ता के कान  में फुसफुसाया "आँख रहने दो एक आँख चली जाएगी परन्तु नौकरी तो मिल जाएगी "
वक्ता को सांप सूंघ गया। पर उसकी बात भी सही थी । भयावह रूप से ही सही पर सही तो थी ही ।
लेकिन क्यूँ?