The power of thought

The power of thought

Tuesday, June 28, 2011

दशावतार की प्रतीक्षा

रात के पहरुओ में,
अंधकार के झुरमुटो में |
एक टीस हो गयी ,
सुनी आँखे पानी से भर गयी ||
राम और केशव की जन्म-भूमि,
निवेदिता और टेरेसा की अतुलनीय कर्म-भूमि ,
लुट चुकी है 
बिक चुकी है |
अपने ही प्रांगण में बेआबरू हो खड़ी है,
कृष्ण के इंतज़ार में द्रौपदी रो पड़ी है ||
युधिष्ठर सा सौम्य यहाँ नहीं चाहिए ,
यहाँ तो भीम की प्रलयंकारी गर्जना गुंजायमान होनी चाहिए |
विभीषण सा भ्राता न भी हो तो गम नहीं,
कर्ण से सखा से कुछ कम हम अब स्वीकार नहीं ||
माताओं  की सुनी कोखों की,
बहनो की झिलमिलाती अंखियो की 
प्रतीक्षा कब समाप्त होगी ?
घोटालों  के इस देश में कब दशावतार की शुभ वो घडी होगी??




Saturday, June 11, 2011

स्वप्न की बेला

स्वप्न की बेला टूटेगी कब 
पौरुषता जागेगी कब|
आशंका के बादल ठीठकेंगे कब
ये भयावरण उतरेगा कब ||

मानवता चीखी थी जब 
लोकतंत्र रोया था जब |
अत्याचार मुस्काया था जब 
देख बेटे की लाश माँ रोई थी जब ||

अन्याय वेला घिर आई है अब 
लगता पाप से हारा है पुण्य अब |
एक बिजली सी कौंधी है अब 
न बैठेंगे अब खामोश हम ||

अब हैं खड़े भयावरण को उतार सब
देखते हैं अब सीधे आँखों में आँखें डाल सब ||
हैं हाथो में हाथ डाले तैयार सब 
निर्वस्त्र माँ को पहनाएंगे अब वस्त्र सब||


Saturday, February 26, 2011

यूथेनेसिया:मुझे ससम्मान मरने का हक़ है

यूथेनेसिया या ईच्छा-मृत्यु आज सभ्य मानव समाज के लिए एक अजीब सा प्रश्न बनकर सामने आ खड़ी हुई है | कानूनन इसकी अभी बहुत सी राष्ट्रों मे इजाजत नही, बहुत से विद्वान इसे एक निंदनीय प्रस्ताव मानते है और इसके लिए कभी भी समर्थन नही कर सकते | यूथेनेसिया को आत्महत्या कह नकार देना क्या एक उचित कदम  है  आज इस बात पर एक सार्थक बहस और विचार की जरुरत है । जिस तरह एक शुतुरमुर्ग किसी शिकारी को देख अपना सर जमीन में  छुपा यह समझता है की संकट टल गया उसी  तरह की खुद को झूठी सांत्वना दे रहा है आज का यह समाज| 
   भारत का कानून सहित हर लोकतान्त्रिक देश का कानून उसे ससम्मान जीने की इजाजत  देता है तो वही कानून जब वो इंसान जीने में लाचार हो जाये तो उसे ससम्मान मरने की इजाजत क्यों नही देता |प्राचीन काल मे भी हमारे ऋषियों द्वारा योग द्वारा शरीर छोड़ने की बातें सुनने मे आती है वो भी तो एक तरह की ईच्छा-मृत्यु ही थी| योग का आठवां आसन "समाधी " देखा जाये तो यही तो है|
अगर बात भारतीय दर्शन की हो तो "गीता " में खुद भगवान ने कहा है"यह शरीर हमारी आत्मा के लिए एक वस्त्र की तरह है जिस तरह हम अपने पुराने वस्त्रो को उतर कर नए वस्त्र धारण करते है उसी तरह हमारी आत्मा भी पुराने,जर्जर शरीर को छोड़ नया शरीर धारण करती है " तो क्या हमारी आत्मा को ये इजाजत नही होनी चहिये की वो अपनी मर्जी से नए शरीर को धारण करने को स्वतन्त्र हो सके ? जब कोई इंसान इस हालत में हो की वो बिना किसी सहारे के अपनी भावनाओं  को व्यक्त भी ना कर सके और वो खुद अपने इस जीवन से उब चूका हो तो क्या उसे इस कष्टपूर्ण जीवन से मुक्ति पाने का मौका देना क्रूरता है ? गुजारिश का नायक अपने विरोधी को एक बक्से में थोड़ी देर के लिए बंद कर ये सन्देश पूरी दुनिया को देता है की बिना उनके दर्द को समझे हुए उनके भविष्य का फैसला करना उचित नही , क्रूरता यहाँ  है |
सवाल यही है क्या उन्हें हमेशा के लिए इस पीड़ा को भुगतने देना क्रूरता नही ?क्या उनकी विवशता को न समझना क्रूरता नही?क्या उन्हें हमेशा के लिए किसे सहारे पर जीवित रहने के लिए छोड़ना क्रूरता नही? क्या किसी की याचना को सामाजिकता के दायरे  में लेन की कोशिश करते हुए ठुकरा देना क्रूरता नही?