The power of thought

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Wednesday, February 9, 2011

सुरक्षा परिषद को भारत की आवश्यकता


भारत सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बने, यह मुद्दा आजकल हमारी विदेश नीति की सर्वोच्च प्राथमिकता बन गयी है | कोई भी देश हो और कोई भी भी राजनेता, कोई हमारे देश आया हो या हमारे  देश के राजनेता किसी दूसरे देश मे हो , हम उसी तरह संयुक्त     
पत्रकार वार्ता मे उस प्रतिनिधि से हमरे दावे का समर्थन करवाने की कोशिश करते है जिस तरह हिंदी फिल्मो मे वकील गवाह से जज के सामने बुलवाने की कोशिश  करता है | काफी लम्बे अर्से से हम इसी प्रयास मे लगे हुए है और स्थाई सदस्यों मे से चीन के अलावा सभी देशो ने भारत के पक्ष का समर्थन कर ही दिया | परन्तु क्या इन 5 देशो के समर्थन  कर देने भर  से भारत स्थाई सदस्य बन जाएगा? जवाब सरल है, नहीं |
यह किस राष्ट्र को या खुद भारत को नही पता की आज अकेले भारत को सुरक्षा परिषद् का सदस्य बनाना संभव नही बल्कि लगभग असंभव है| क्या आज संयुक राष्ट्र के 2 /3 अर्थात सवा सौ राष्ट्र अकेले भारत के लिए ऐसा कोई प्रस्ताव लाने को तैयार हो जायेंगे और सुरक्षा परिषद् का बहुमत और सारे  वीटोधारी राष्ट्र उसे मानने  को तैयार  हो जायेंगे ? भारत ने ऐसा कौन  सा चमत्कारी काम कर दिया है की सारी दुनिया उसके चरणों मे लोटने लगे और कहे"हे देवता!आप तुरंत सुरक्षा परिषद् मे स्थाई सीट ग्रहण कीजिये वर्ना संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व ही निरर्थक हो जायेगा|
भारत ने ऐसा कोई काम नही किया और न ही निकट भविष्य मे ऐसा कोई काम करने जा रहा है | साफ़ है जब संयुक्त राष्ट्र का पुनर्गठन होगा तो स्वाभाविक रूप से सुरक्षा परिषद् का भी विस्तार  होगा तो उस समय भारत को कौन  रोक सकता है ?
                                       हाल ही हुए अस्थायी सदस्यों के चुनाव मे भारत प्रचन्ड बहुमत  लेकर चयनित हुआ, स्पष्ट है की जब भी सुरक्षा परिषद् का विस्तार होगा भारत का स्थान सर्वप्रथम होगा
भारत के पक्ष को समर्थन देने वाले कुछ प्रमुख तर्क है :
  1. दुनिया की छठी विधिसम्मत  परमाणु शक्ति |
  2. विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र,जिसका सुरक्षा  परिषद् मे होना खुद सुरक्षा परिषद् के लिए गौरव की बात होगी|
  3. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश का प्रतिनधित्व |
  4. निकट भविष्य का विश्व की तीसरी आर्थिक महाशक्ति |
  5. दुनिया के १५० गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों  का नेता, जिसका सुरक्षा परिषद् मे होना निश्चय ही तीसरी दुनिया का आनंद का विषय होगा |
  6. दक्षिण एशिया के राष्ट्र काफी समृद्ध तरीके से उभर रहे है, उनके नेता के तौर पर भारत को सदस्यता मिलनी ही चाहिए |
  7. एक मजबूत सैन्य  ताकत , भारत के अलावा ऐसा कोई राष्ट्र नही जो दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और हिंद महासागर मे सुरक्षा और शांति बनाये रख सके|
  8. भारत ने हमेशा ही संयुक्त राष्ट्र के शांति  प्रयासों मे आगे आकर भाग लिया है |
  9. हर मोर्चे पर आगे बढता हुआ राष्ट्र |

स्पष्ट है सुरक्षा परिषद की जितनी आवश्यकता भारत को है उतनी ही आवश्यकता सुरक्षा परिषद् को भारत की है | किसी के आगे हाथ फ़ैलाने की जरुरत नही ये तो खुद आगे चलकर भारत के पास आने को बेताब है |         साभार :-नवभारत टाईम्स(लेख की भावना के लिए )

Saturday, February 5, 2011

मौत की भी राजनीति, मानवता पर तमाचा

"मैं हनीफ पर हुए अत्याचारों को सुन कर रात भर सो नही पाया " कुछ ऐसा ही बयान था हमारे प्रधानमंत्री  का| परन्तु डॉ. आशीष  चावला की मौत के बाद उनके परिवार पर हुए अत्याचारों के बावजूद भारत के एक चपरासी तक की नींद नहीं टूटी| क्या आपने ऐसी खबर कभी पड़ी या सुनी है की सामान्य परिस्थिति मे किसी की मृत्यु हुई हो और उसका अंतिम संस्कार लगभग 11 महीने बाद हुआ हो? मैंने व्यक्तिगत रूप से ऐसा कभी नही सुना परन्तु ऐसा ही कुछ घटित हुआ दिल्ली निवासी डा. आशीष चावला के साथ जो सउदी अरब के नजरान स्थित किंग खालिद अस्पताल मे कार्डियोलोजी विभाग मे कार्यरत थे | उनका निधन 31 -01 -2010 को हृदयाघात से हो गया था परन्तु उनकी लाश 11 माह तक वहां के अस्पताल मे पड़ी रही|
                         अरब मे डा. चावला,उनकी धर्मपत्नी डा.शालिनी चावला,डॉ वर्ष की पुत्री और नवजात पुत्र 'वेदांत' पर जो अत्याचार हुआ उसे  जिस भारतीय ने सुना उसकी नींद उड़ गयी परन्तु हमारे प्रधानमंत्री की नहीं| डा. शालिनी के चाचा श्री. एच.जी.नागपाल ने प्रधानमंत्री से गुहार भी लगायी,परन्तु उन्होंने एक चिट्ठी तक लिखना मुनासिब नही समझा| डा. आशीष की मृत्यु उस समय हुई जब डा.शालिनी को 8 माह का गर्भ था| विडम्बना यह की अस्पताल के शव-गृह मे पति की लाश और चिकित्सा कक्ष  मे पत्नी भर्ती | डा.चावला के साथ काम करने  वाले  कुछ सहकर्मियों ने वह यह शिकायत  दर्ज करवाई की डा. चावला ने इस्लाम काबुल कर लिया था इसलिए उनकी पत्नी ने उन्हें जहर  देकर मार दिया | 16 मार्च 2010 को पुलिस ने डा.शालिनी को जेल मे डाल दिया |
            भारत मे तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने अवश्य सउदी अरब के राजदूत से बातचीत की परन्तु उसने मदद से इंकार कर दिया| अप्रैल 2010 मे पुनःपरीक्षण मे वहां के चिकित्सको ने बताया उनकी मौत स्वाभाविक हृदयाघात से हुई | परन्तु डा शालिनी की मुसीबतें यही समाप्त नही हुई शव को परिजनों के हवाले करने के पहले वह के काजी  ने उनपर 3 शर्तें लादी
  1. सरकार से कोई मुआवजा  नही माँगा जायेगा|
  2. शव को भारत मे इस्लामी तरीके से दफनाया जाएगा |
  3. मामले को दुबारा से नही खुलवाया जायेगा |
इन शर्तो को मानने के बावजूद उनकी राह आसान नही हुई और वो शव लेकर 25 दिसम्बर को ही वह से चल सके | एक भारतीय परिवार के साथ इतना बड़ा जुल्म हुआ फिर भी हमारे देश के करता-धर्ता चुप रहे, क्यों? दुनिया भर की खबरें प्रसारित करने  वाला,कौवो और कबूतरों  से लेकर बिल्लियों तक पर हुए अत्याचारों की कहानिया सुनाने वाला मीडिया भी खामोश रहा, क्यों? मानवता के नाम पर भी राजनीति हो रही है, आखिर क्यों? आज सनातनी  हिन्दू पैदा होना भी 1 अपराध हो गया , आखिर क्यों? और सबसे बड़ा सवाल हम लोग हाथ पर हाथ धर कर बैठे हुए है , आखिर क्यों?
क्यों?क्यों?और क्यों?  

Saturday, October 2, 2010

भारत के अंत की झलक

आख़िरकार 60 वर्षो की मुकदमेबाजी के बाद अदालत ने राम-जन्म भूमि के मामले मे अपना फैसला सुना दिया और जैसी आशंका थी यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का धर्मनिरपेक्ष  फासिला रहा | जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट  से साफ़ हो गया था की विवादित स्थल वास्तविकता मे 1 मंदिर ही था तो फिर उसके  बाद असमंजस कैसा ? जहाँ करोडो लोगो की आस्था जुडी हो उसका फैसला करने मे विलम्ब  कैसा , वेग भी जब वह  आस्था न्यायसंगत हो ? स्पष्ट है की मुस्लिम हिन्दू बंधुओ को इस पर प्रसन्नता ही हुई होगी की जब उनका दावा ख़ारिज हो गया था उसके बावजूद उन्हें 1 /3 जमीन प्राप्त हो गयी |
                                मेरे कई मित्र व सम्बन्धी मुझसे 1 सवाल पूछते  है " आख़िरकार मंदिर-मस्जिद पर इतना हल्ला क्यों ? क्यों न अपने मुस्लिम हिन्दू भाईयों को ही जमीन दे दी जाये ?" वैसे सभी लोगो को मेरा 1 ही उत्तर है "विवाद मंदिर का नही , उपासना स्थल का बाद मे , यहाँ राम-लाला की जन्मभूमि का मसला है | नमाज कही भी पड़ी जा सकती है , वह या 1 किमी दूर भी , परन्तु जन्मस्थान तो 1 इंच भी खिसकने के बाद अपनी महत्ता खो बैठता है | इस मसले को वो सभी लोग  समझ सकते है जिन्हें अपने घर  से प्रेम है जहाँ उनका जन्म हुआ , उस  कलम से प्रेम है जो उनके सबसे प्रिय शिक्षक ने सिर्फ उन्हें ही दिया , उस कमरे से प्रेम है जहाँ उनकी संतानों का जन्म हुआ , जहाँ उनके माता-पिता का देहावसान  हुआ | लेकिन अगर आप मे यह प्रेम नही तो आप इस आस्था को महसूस नही कर सकते |
                            वैसे भी, बाबर कोई महापुरुष या संत तो था नही , था तो वह  1 आक्रमणकारी ही | यह भी विचारणीय है की कोई भी विदेशी आक्रान्ता अपने परिवार के साथ यहाँ नही बसा , बाबर से पहले | तो यह तो स्वत: स्पष्ट है की भारतीय हिन्दू मुस्लिमो के पूर्वज भी पूर्व मे सनातनी हिन्दू ही थे जिनके आराध्य नि:संदेह श्री राम होंगे | अतः राम पर प्रश्न उनके द्वारा उनके पूर्वजो का भी अपमान  है|
               आजकल 1 बात और कही जा रही है  की आज का भारतीय इस मसले से उपर उठ चूका है तो वास्तविकता यह है की आज  का भारतीय उपर नही उठा बल्कि उदासीन व निष्क्रिय हो गया है जो आज अपने राष्ट्र व देश पर मंडराते खतरे पर भी चुप बैठा है अतः ये उसकी परिपक्वता नही अपितु अपरिपक्वता की ही निशानी है जो पुनः राष्ट्रघाती है , जैसा की मैंने अपने  पिछले ब्लॉग मे भी कहा है |
                अंत मे सबसे प्रमुख बिंदु , तीनो माननीय न्यायधीशों ने मन की विवादित स्थल ही राम जन्मभूमि है फिर भी उन्होंने 2 -1  से सुन्नी वक्फ बोर्ड को 1/3 हिस्सा दिया | पूरे भू-खंड को 3 हिस्सों मे बांटने का उनका फैसला यक़ीनन अंग्रेजो की याद दिलाता है जो आपाधापी मे भारत को टुकड़ो मे बाँट  गए थे और जिसकी टीस आज भी राष्ट्रवादियो को सालती है | पर विचारणीय बिंदु यह है की क्या अदालत का यह फैसला तब भी आता अगर वह सुन्नी वक्फ बोर्ड की जीत होती ?




              कहीं , यह भारत के अंत की 1 झलक तो नही ? क्योंकि जो राष्ट्र अपनी संस्कृति की रक्षा करने मे अक्षम है वह  विश्व के मानचित्र मे बने रहने मे सक्षम कैसे हो सकता है